भारत की नई स्पेस छलांग! SpaceX जैसी रॉकेट इंजन तकनीक पर स्टार्टअप का बड़ा दांव

बेंगलुरु

बेंगलुरु की स्पेस स्टार्टअप एस्ट्रोबेस स्पेस टेक्नोलॉजीस ने देश का पहला फुल-फ्लो स्टेज्ड कंबशन (FFSC) रॉकेट इंजन बनाया है. कंपनी इस इंजन की आंध्र प्रदेश में टेस्टिंग कर रही है. उसका दावा है कि यह दुनिया की सबसे एडवांस रॉकेट इंजन तकनीकों में से एक है. इस इंजन की मदद से भविष्य में दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट बनाए जा सकेंगे और ज्यादा सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे जा सकेंगे. कंपनी का लक्ष्य 2028 तक इस इंजन के साथ पहला रॉकेट लॉन्च करना है। 

भारत के पास इस समय करीब 55 ऑपरेशनल सैटेलाइट हैं, जबकि अमेरिका के पास 13 हजार से ज्यादा और चीन के पास करीब 1,500 सैटेलाइट हैं. ऐसे में आने वाले समय में ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए भारत को अपनी लॉन्च क्षमता बढ़ानी होगी. कंपनी का कहना है कि यह इंजन इसी दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। 

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आंध्र प्रदेश में बने टेस्ट सेंटर में इंजन की लगातार हॉट फायर टेस्टिंग हो रही है. इसमें इंजन को पूरी ताकत से चलाकर देखा जाता है कि वह तेज गर्मी और दबाव में सही तरीके से काम करता है या नहीं. कंपनी के मुताबिक, इंजन की डिजाइन से लेकर 3D प्रिंटिंग, मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली तक का पूरा काम भारत में ही किया गया है। 

क्या है FFSC रॉकेट इंजन?
इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत इसका FFSC इंजन है. इसे दुनिया की सबसे एडवांस रॉकेट इंजन तकनीकों में गिना जाता है. आम रॉकेट इंजन में ईंधन का कुछ हिस्सा सिर्फ पंप चलाने में खर्च हो जाता है. लेकिन इस तकनीक में ईंधन और ऑक्सीजन का पूरा इस्तेमाल इंजन की ताकत बढ़ाने में होता है. इससे इंजन ज्यादा ताकतवर और ज्यादा असरदार बनता है। 

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कंपनी का दावा है कि यह इंजन करीब 800 किलोन्यूटन तक ताकत पैदा करेगा. साथ ही इसकी क्षमता बढ़ने से रॉकेट ज्यादा वजन अंतरिक्ष में ले जा सकेगा. यही वजह है कि दुनिया में बहुत कम देश और कंपनियां इस तकनीक पर काम कर रही हैं। 

मीथेन से चलेगा इंजन
यह इंजन लिक्विड ऑक्सीजन (LOX) और मीथेन से चलेगा. मीथेन साफ तरीके से जलता है और इंजन में कालिख कम छोड़ता है. इससे इंजन को बार-बार इस्तेमाल करना आसान हो जाता है. इसलिए भविष्य के रीयूजेबल रॉकेट के लिए इसे अच्छा ईंधन माना जाता है। 

कंपनी का कहना है कि उसने भारत की पहली मीथेन आधारित रॉकेट इंजन टेस्ट फैसिलिटी भी बनाई है. सितंबर 2025 में इसके छोटे मॉडल का पहला हॉट फायर टेस्ट सफल रहा था। 

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2028 तक पहला लॉन्च करने का लक्ष्य
एस्ट्रोबेस का लक्ष्य 2027 में बूस्टर का हॉप टेस्ट और 2028 में पहला रॉकेट लॉन्च करना है. कंपनी को जून 2026 में IN-SPACe के टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड के तहत 25 करोड़ रुपये की मदद भी मिली है। 

कंपनी का दावा है कि उसका रॉकेट लो-अर्थ ऑर्बिट में 3 टन तक का पेलोड ले जा सकेगा. इसके पहले स्टेज को वापस लाकर दोबारा इस्तेमाल करने की योजना है. वहीं इंजन को 50 से ज्यादा बार इस्तेमाल करने लायक बनाया जा रहा है. अगर यह योजना सफल रही तो भारत के लिए ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च करना और कम लागत में रीयूजेबल रॉकेट बनाना आसान हो सकता है। 

 

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